नारीत्व का अभिशाप-महादेवी वर्मा।

'नारीत्व का अभिशाप' _महादेवी वर्मा।
चाहे हिंदू नारी की गौरव गाथा से आकाश गूँज रहा हो, चाहे उसके पतन से पाताल काँप उठा हो, परंतु उसके लिए 'न सावन सूखे न भादों हरे' की कहावत चरितार्थ होती रही है। 
उसे अपने हिमालय को लजा देने वाले उत्कर्ष तथा समुद्र तल की गहराई से स्पर्धा करने वाले अपकर्ष दोनों का इतिहास आँसुओं से लिखना पड़ा है और संभव है, भविष्य में लिखना भी पढ़े।
प्राचीन से प्राचीनतम काल में जब उसने त्याग, संयम तथा आत्मदान की आग में अपना सारा व्यक्तित्व, सारी संजीवता और मनुष्य स्वभावोचित इच्छाएँ तिल तिल गला कर उन्हें कठोर आदर्श के साँचे में ढाल कर एक देवता की मूर्ति गढ़ डाली तब भी क्या संसार विस्मित हुआ या मनुष्यता कातर हुई? 
क्या नारी के बड़े-से-बड़े त्याग को, आत्म-निवेदन को, संसार ने अपना अधिकार नहीं किंतु उसका अद्भुत दान समझकर नम्रता से स्वीकार किया है? 
कम से कम इतिहास तो नहीं बताता की उसके किसी बलिदान को पुरुष ने उसकी दुर्बलता के अतिरिक्त कुछ और समझने का प्रयत्न किया।
अग्नि में बैठकर अपने-आपको पतिप्राणा प्रमाणित करने वाली स्फटिकसी स्वच्छ सीता में नारी की अनंत युगों की वेदना साकार हो गई है।
कौन कह सकता है, उसे भागते हुए युग ने अपनी उस अलौकिक कृति, अपने मनुष्यत्व की शब्द सीमा में बँधे विशाल देवत्व की ओर एक बार मुड़ कर देखने का भी कष्ट सहा!
 मनुष्य की साधारण दुर्बलता से युक्त दीन माता का वध करते हुए ना पराक्रमी परशुराम का ह्रदय पिघला, न मनुष्यता की असाधारण गरिमा से गुरु सीता को पृथ्वी में समाहित करते हुए राम का हृदय विदीर्ण(Diffuse/बिखरा ) हुआ। मानो पुरुष-समाज के निकट दोनों जीवनों का एक ही मूल्य था। एक जीवित व्यक्ति का इतना कठोर त्याग, इतना निर्मम बलिदान दूसरा ह्रदयवान व्यक्ति इतने अकातर भाव से स्वीकार कर सकता है, यह कल्पना में भी क्लेश देती है, वास्तविकता का तो कहना ही क्या!
  

 इस विषमता का युगांतरदीर्घ कारण केवल एक ही कहा जा सकता है दुर्बलता, जिसका प्रायः कोमलता के नाम से नामकरण किया जाता है। नारी के स्वभाव में कोमलता के आवरण में जो दुर्बलता छिप गई है वही उसके शरीर में सुकुमारता बन गयी। यह सत्य नहीं है कि वह इस दुर्बलता पर भेजा नहीं पा सकती, पर यह निर्विवाद सिद्ध है कि वह अनादि काल से उसे अपना अलंकार समझती रहने के कारण त्यागने पर उद्यत ही नहीं होती। उसके विचार में इसके बिना नारीत्व अधूरा है। दुर्बलता मनुष्य-जीवन का अभिशाप रही है और रहेगी, परंतु शरीर और मन दोनों से संबंध रखने वाली दुर्बलताओं में कौन घोरतर अभिशाप है, यह कहना कठिन है।
समय-विशेष तथा अवस्था विशेष के अनुसार हम पशुबल तथा मानसिक बल प्रयोग करने पर विवश होते हैं और समाज तथा अवस्था के अनुसार ही हमारे लिए मानसिक और शारीरिक दुर्बलताएं अभिशाप सिद्ध होती रही हैं। जीवन में इन दोनों शक्तियों का समन्वय ही सफलता का विधायक रहा है अवश्य, परंतु यह कहना असत्य न होगा कि प्रायः एक शक्ति की न्यूनता दूसरी की अधिकता से भर जाती है। विशेषकर नारी के लिए पशुबल की न्यूनता को आत्मबल से पूर्ण कर लेना स्वभाव सिद्ध है। वह यदि सम्मुख युद्ध में अस्त्र-संचालन द्वारा प्रतिद्वंदीयों को विस्मित कर सकी है तो बिना अस्त्र के या बलदर्शन के असंख्य विपक्षियों से घिरी रहकर भी अपने सम्मान की रक्षा कर चुकी है।


  नारी ने अपनी शक्ति को कभी जाना और कभी नहीं जाना। वर्तमान युग तो उसके न जाानने की एक करुण कहानी है। नारीत्व की कोमलता नाम से पुकारी जाने वाली दुर्बलता के साथ सदा से बँधी हुई वेदना और तज्जनित आपत्ती प्रत्येक युग तथा प्रत्येक परिस्थिति में नवीन रूप में आती रही है, परंतु उसकी वर्तमान दशा करुणतम है। उसके आज के और अतीत के बलिदानों में उतना ही अंतर है जितना स्वेच्छा से स्वीकृत नारीत्व की गरमा से गौरववती के जोहरव्रत और बलात् लाठियों से घेर-घार कर पशुबलि के समान झोंकी जाने वाली नारी के अग्निप्रवेश में। आज की मातृशक्ति की वेदना-भार से जर्जर परंतु अपने कष्ट के कारण या निराकरण के साधनों से एकदम अनभिज्ञ मुंह पशु के करुण नेत्रों से बहती हुई अश्रुधारा के समान ही निरंतर प्रभावित हो रही है।
वह स्वयं अपनी वेदना की कारण नहीं जानती और न अपने असह्य कष्ट के प्रतिकार की भावना से परिचित है। जिन कष्टों से उसके जीवन का एक बार भी संस्पर्श हो जाता है उन्हें वह अपने कर्तव्य की परिधि में रख लेती है। कष्ट सहते-सहते उसमें क्लेश की तीव्रता के अनुभव करने की चेतना भी नहीं रही, उसकी उपयुक्तता-अनुपयुक्तता पर विचार करना तो दूर की बात है। हमारे समाज उसे पाषाण प्रतिमा के समान सर्वदा एकरूप, एकरस, जीवित मनुष्य के स्पंदन, कंपन और विकास से रहित होकर जीने की आज्ञा दी है, अ त: युगों से इसी प्रकार जीवित रहने का प्रयास करते-करते यदि वह निर्जीव-सी हो उठी तो आश्चर्य की क्या बात है !
 हम जब बहुत समय तक अपने किसी अंग से उसकी शक्ति से अधिक कार्य लेते रहते हैं तो शिथिल और संज्ञाहीन-सा हुए बिना नहीं रहता। नारी जाति भी समाज को अपनी शक्ति से अधिक देकर अपनी सहन-शक्ति से अधिक त्याग स्वीकार करके संज्ञाहीन-सी हो गई है, नहीं तो क्या बलिस्ट-से-बलिष्ठ व्यक्ति को दहला देने वाली, कठोर-से-कठोर व्यक्ति को रुला देने वाली यंन्त्रणाएँ वह इतने मूक भाव से सहती रह सकती ! 
हिंदू नारी का, घर और समाज इन्हीं दो से विशेष संपर्क रहता है। परंतु इन दोनों ही स्थानों में उसकी स्थिति कितनी करुण हैं इसके विचारमात्र से ही किसी भी सहृदय का ह्रदय काँप बिना नहीं रहता। अपने पितृ ग्रह में उसे वैसा ही स्थान मिलता है जैसा किसी दुकान में उस वस्तु को प्राप्त होता है जिसके रखने और बेचने दोनों ही में दुकानदार को हानि की संभावना रहती है। जिस घर में उसके जीवन को ढ़ालकर बनना पड़ता है, उसके चरित्र को एक विशेष रूप-रेखा धारण करनी पड़ती है, जिस पर वह अपनी शैशव का सारा स्नेह ढ़लकाकर भी तृप्त नहीं होती उसी घर में वह भिक्षुक के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
दु:ख के समय अपने आहत हृदय और शिथिल शरीर को लेकर वह उसमें विश्राम नहीं पाती, भूल के समय वह अपना लज्जित मुख उसके स्नेहांचल में नहीं छिपा सकती और आपत्ति की समय एक मुट्ठी अन्न की भी उस घर से आशा नहीं रख सकती। ऐसी ही है उसकी वह अभागी जन्मभूमि, जो जीवित रहने के अतिरिक्त और कोई अधिकार नहीं देती।
पतिगृह, जहां इस उपेक्षित प्राणी को जीवन का शेष भाग व्यतीत करना पड़ता है, अधिकार में उससे कुछ अधिक परंतु सहानुभूति में उससे बहुत कम है इसमें संदेह नहीं। यहाँ उसकी स्थिति पलभर में आशंका से रहित नहीं। यदि वह विद्वान पति की इच्छानुकूल विदुषी नहीं है तो उसका स्थान दूसरी को दिया जा सकता है, यदि वह सौदर्योपासक पति की कल्पना के अनुरूप अप्सरा नहीं है तो उसे अपना स्थान रिक्त कर देने का आदेश दिया जा सकता है, यदि वह पति-कामना का विचार करके संतान या पुत्रों की सेना नहीं दे सकती, यदि यह रुग्ण है या दोषों का नितांत अब आओ होने पर भी पति की अप्रसन्नता की दोषी है तो भी उसे उस घर में दासत्व स्वीकार करना पड़ेगा।
    इस विषय में उसके 'क्यू' का उत्तर देने को गृहस्वामी बाध्य नहीं, समाज बाध्य नहीं। यदि स्त्री ऐसे घर को, ऐसी अस्थायी स्थिति को संतोषजनक न समझे तो उसे इन सबके निकट दोषी होना पड़ेगा। उसे अपने विषय में कुछ सोचने-समझने का अधिकार नहीं, क्योंकि उसका जीवन 'वृद्ध रोगवश जड़ धन हीना' में से जो पिता का बोझ हल्का करने में समर्थ हो गया उसी का जन्म-जन्मांतर के लिए निवेदित हो गया। चाहे वह स्वर्णपिंजर की बंदिनी हो चाहे लौहपिंजर की, परंतु बंदिनी तो वह है ही और ऐसी कि जिसके निकट स्वतंत्रता का विचार तक पाप कहा जाएगा। 'स्त्री न‌ स्वातन्त्र्यम् अर्हति' शास्त्र ने कहा है न ! जिसके चरणों में उसका जीवन निवेदित है यदि वह उसे संदूक में बंद बालक की गुड़िया के सामान संसार की दृष्टि से, सूर्य की धूप और पवन के स्पर्श से बचाकर रखना चाहता है तो भी वह इस कार्य के लिए उसे साधुवाद ही देना उचित समझेंगे। उनके विचार में नारी मानवी नहीं, देवी है और देवताओं को मनुष्य के लिए आवश्यक सुविधाओं का करना ही क्या है ! नारी के देवत्व की कैसी विडंबना है !
यदि दुर्भाग्य से स्त्री के मस्तक का सिंदूर धुल गया तो उसके लिए संसार ही नष्ट हो गया। यह ऐसा अपराध है जिसके कारण उसे मृत्यु-दंड से भी  भीषणतर दण्ड भोगते हुए तिल-तिल घुलकर जीवन के शेष, युग बन जाने वाले क्षण व्यतीत करने होते हैं। ऐसी परिस्थिति में यदि दीर्घकाल तक गुड़िया बनी रहने वाली स्त्री मानव के उत्तरदायित्व से युक्त होती है तो उसे अपने अभीशापमय जीवन के साथ अनेक दुधमुँहे बालकों को लेकर ऐसे अंधकार में मार्ग ढूंढना पड़ता है जिसमें प्रत्येक यात्री दूसरे को भ्रान्ति में डाल देना अपराध ही नहीं समझता। यदि अबोध बालिका है तो समाज और परिवार, सनातन नियम के पालन में अपने-आपको राजा हरिश्चंद्र से अधिक दृढ़प्रतिज्ञ प्रमाणित करने में पीछे न रहेंगे। जिन मानवीय दुर्बलताओं को वे स्वयं अविरत संयम और अटूट साधना से भी जीवन के अंतिम क्षणों तक न जीत सकेंगे उन्हीं दुर्बलताओं को, किसी भूली हुई अस्पष्ट सुधि द्वारा जीत लेने का आदेश वे उन अबोध बालिकाओं को दे डालेंगे जो जीवन से अपरिचित हैं। उनकी आज्ञा है, उनके शास्त्रों की आज्ञा है और कदाचित् उनके निर्मम ईश्वर की भी आज्ञा है कि वे  जीवन की प्रथम अँगड़ाई को अंतिम प्राणायाम में परिवर्तित कर दें, आशा की पहली सुनहरी किरण को विषाद के निविड़ अंधकार में समाहित कर दें और सुख के
 मधुर पुलक को आँसुओं में बहा डालेें। इस विराग की साधना के लिए उन्हें अनंत प्रलोभनों से भरे हुए, वैभव से सजे हुए और बांधिकों से पूर्ण स्थान के अतिरिक्त कोई एकांत स्थान भी नहीं मिल पाता।
 

  इतने प्रकार की शारीरिक और मानसिक कष्टों को देकर भी स्त्री के दुर्भाग्य का संतोष नहीं हुआ, इसका प्रमाण आज की नारी-अपहरण की समस्या है। नारी-जीवन की उस करुण कहानी का इससे घोरतर उपसंहार और हो भी क्या सकता था ? जिन रूप से, जिन साधनों के द्वारा इस लोमहर्षक कार्य का संपादन हो रहा है उसे सुनकर निर्जीव भी जाग जाते, परंतु हमारी निंद्रा तो मृत्यु की महानिंद्रा को भी लजा देने वाली हो गई है, बिना सर्वनाश के उसका टूटना संभव नहीं। अपर्हत हिंदू स्त्रियों में कुछ तो ऐसी रहती हैं जिसका जीवन गृह और समाज की अमानुषिक यातनाओं से इतना दुर्वह हो जाता है कि छुटकारे का कोई भी द्वार उन्हें बुरा नहीं लगता और वे बहकावे में आकर एक नरक से बचने के लिए दूसरे नरक की शरण लेने की उद्यत हो जाती हैं ! उनका आहत हृदय इतना चेतनाशून्य हो उठता है कि उसमें मानापमान का अनुभव करने की शक्ति ही नहीं रह जाती है। उन्हें तो घायल के समान क्षणभर के लिए ऐसा स्थान चाहिए जहां उनकी शीर्ण शरीर को कुछ विश्राम मिल सके, अतः सहानुभूति के, चाहे वह सच्ची हो या झूठी, दो शब्द उन्हें बेदाम खरीद सकते हैं। यदि ऐसे हृदयों को समय पर हमीं से आश्वासन तथा सान्त्वना मिल सकती, यदि हमीं इन्हें मनुष्य समझ सकते, वर्षों के जम-जमकर इनके जीवन को पाषाण बनाने वाले आँसुओं की करुण कहानी सुन लेते और इनके असह्य दु:खभार को अपनी सहानुभूति से हल्का करने का प्रयत्न कर सकते तो आज का इतिहास कुछ और ही हो जाता।
परंतु हम पशु-पक्षियों को, पाषाणों को, अपनी सहानुभूति बाँट सकते हैं, नारी को निर्मम आदेश के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे पाते। देवता की भूख हम समझते हैं, परंतु मानवीय ही नहीं ! इसके अतिरिक्त ऐसी महिलाओं की संख्या भी कम नहीं, जिनका बलात् अपहरण किये जाने पर भी खोज के लिए विशेष प्रयत्न नहीं होता। पत्रों में प्रकाशित ऐसी घटनाओं की संख्या भी कम नहीं, अप्रकाशित अपरहण कहानियों के विषय में तो कुछ कहना ही व्यर्थ है। इन अभागिनियों के उद्धार के लिए जो उपाय किया जा रहा है वह तो बहुत सराहनीय नहीं जान पड़ता। जिस समाज में ऐसी घटनाएँ 12-13 की संख्या में प्रतिदिन घटित होती हो उसके युवकों को सुख की नींद आना संसार का आठवां आश्चर्य है।
     कुछ अधिक तर्कशील पुरुषों का कहना है कि स्त्रियों को स्वयं अपनी रक्षा करने से कौन रोकता है ? इस कथन पर हँसना चाहिए या रोना, यह नहीं कहा जा सकता। युगों की कठोर यातना और निर्मम दासत्व ने स्त्रियों को अपनापन भी भुला देने पर विवश न किया होता तो क्या आज ये अपने सम्मान की रक्षा में समर्थ न हो सकतीं ? आज विवश पशु के समान इन्हें हाँक ले जाना इसलिए सहज है कि ये पशुओं की श्रेणी में बैठा दी गईं और ज्ञानशून्य कर्म के अतिरिक्त और किसी वस्तु का इन्हें बोध नहीं है। आज भी इनमें जो मनुष्य कहलाने की अधिकारी हैं उन्हें अपनी रक्षा के लिए शस्त्र या सैनिक नहीं रखनी पड़ते !  पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक उनकी गति अबाध है। उनके जीवन में साहस की शक्ति और आत्मसम्मान की गरिमा, प्राणों में आशा और सुनहली कल्पना है, परंतु ऐसी सजीव नारियाँ उँगलियों पर गिनने योग्य हैं। इच्छा और प्रयत्न से अन्य बहनें भी अपनी रक्षा में स्वयं समर्थ हो सकती हैं इसमें संदेह नहीं, परंतु इस इच्छा और प्रयत्न का जन्म उनके हृदय में सहज ही न हो सकेगा। वे तो आत्मनिर्भरता भूल चुकी हैं, फिर उसकी उपयोगिता कैसे समझ सकेंगी।
उनके जीवन को सुव्यवस्थित करने तथा उन्हें मनुष्यता की परिधि में लौटा लाने का प्रयत्न कुछ विदुषी बहनें तथा पुरुष समाज ही कर सकता है। परंतु यह न भूलना चाहिए कि जिस समय घर में आग लगती है उसी समय कुआँ खोदने-वाले को राख के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता, इसी से आपत्ति का धर्म संपत्ति के धर्म से भिन्न कहा गया है। इस समय आवश्यकता है एक ऐसे देशव्यापी आंदोलन की जो सबको सजग कर दे, उन्हें इस दिशा में प्रयत्नशीलता दे और नारी की वेदना का यथार्थ अनुभव करने के लिए लगने वाले इन अत्याचारों का तुरंत अंत हो जाए, अन्यथा नारी के लिए नारीत्व अभिशाप तो है ही।
                      ('श्रृंखला की कड़ियां' से)
      Written by 📙✍️ sanghpriya Gautam

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