घुटन के पन्द्रह मिनट – हरिशंकर परसाई का व्यंग्य। Ghutan Ke Pandrah Minute Vyangya by Harishankar Parsai

"घुटन के पन्द्रह मिनट" : हरिशंकर परसाई जी का व्यंग्य 

              एक  सरकारी  दफ्तर  में  हम  लोग  एक  काम  से  गए  थे – संसद  सदस्य  तिवारी  जी  और मैं | दफ्तर  में  फैलते - फैलते  यह  खबर  बड़े  साहब  के  कानों  तक  पहुंच  गई  होगी  कि  कोई  संसद  सदस्य  अहाते  में  आए  हैं | साहब  ने  साहबी  का   हिदायतनामा  खोलकर  देखा  होगा  कि  अगर  संसद   सदस्य  दफ्तर  में  आए  तो  क्या  करना ?  जवाब  मिला  होगा  उसे  चाय  पिलाना | फिर  देखा  होगा,  अगर  उसके  साथ  कोई  आदमी  हो  तो  उसके  साथ  क्या  करना ?  जवाब  मिला  होगा - उसे  भी  चाय   पिला  देना |  साहब  ने  हिदायतनामा  बंद  करके  बड़े  बाबू  से  कहा  होगा - तिवारी जी  का  काम  ख़त्म  हो  जाए  तो  उन  लोगों  को  चाय  पीने  को  यहां  ले  आना |

काम खत्म होने पर बड़े बाबू ने कहा- साहब के साथ चाय पी लीजिए |  साहबों के साथ औपचारिक चाय पीने के अनुभव मुझे हैं | उन्हें याद करके मैं कुछ घबड़ाया |  मगर सोचा, यह अनुभव सुखदायक भी हो सकता है | हम दोनों साहब के कमरे में घुसे | एक निहायत बनावटी मुस्कान फैली साहब के चेहरे पर | यह मुस्कान सरकार खास तौर से अपने कूटनीतिज्ञों और अफसरों के लिए बनवाती है |  पब्लिक सेक्टर में इसका कारखाना है | प्राइवेट सेक्टर के कारखाने में बनी मुस्कान व्यापारी के चेहरे पर होती है |
  इसे नकली मूंछ की तरह फौरन पहन लिया जाता है |  जब ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के साथ मुस्कुराते सरदार स्वर्णसिंह की तस्वीर देखता तो चकित रह जाता |  भारत-पाक युद्ध, भयंकर दुश्मनी- मगर मुस्कान यह ऊंची क्वालिटी की बनी हुई है |

साहब मुस्कुरा चुके तो तीनों के मन में समस्या पैदा हुई कि अब क्या किया जाए? चाय तो टेबिल पर है नहीं | चपरासी लेने गया होगा |

हमने सोचा, इन्होंने बुलाया है तो निभाने की सारी ज़िम्मेदारी इनकी। वेसमझे थे कि निभाने की जिम्मेदारी हम ले लेंगे |

सेकंड इस दुविधा में कटे  | इतने में साहब समझ गए कि उन्हीं को कुछ निभाना है |

बोले- सुनाइए तिवारी जी, दिल्ली के क्या हाल हैं ?

यह इतना व्यापक सवाल था कि इसका जवाब सिवा इसके क्या हो सकता था कि सब ठीक है | तिवारी जी जानते थे कि दिल्ली पर बम बरस जाएं तो भी इन्हें मतलब नहीं |

थका-सा जवाब दे दिया-सब ठीक है | 

साहब को जवाब माकूल लगा फिर मुझसे पूछा- सुनाइए परसाईजी, साहित्य में कैसा चल रहा है ?

मैंने भी कहा-सब ठीक चल रहा है |

बात खत्म हो चुकी | सरकारी अफसर हैं-राजनीति की बात कर नहीं सकते | साहित्य से कोई सरोकार नहीं |

हम तीनों की नज़र दरवाज़े पर है | हम तीनों चपरासी की राह देख रहे हैं | मगर चपरासी हम तीनों का दुश्मन है | यह आ नहीं रहा | पता नहीं कितनी दूर चाय लेने गया है |

साहब अपनी कुर्सी पर हैं | जब उन्हें लगता है वे बड़े आदमी हैं, वे सीधे तनकर बैठ जाते हैं | मगर जब तिवारीजी अपनी छड़ी की मूठ पर हाथ रखते हैं, तो साहब को एहसास होता है कि सामने संसद सदस्य बैठा है | वे टेबिल पर झुक जाते हैं | मैं यह कवायद बड़ी दिलचस्पी से देख रहा हूं | साहब तने, इसी वक्त तिवारीजी ने छड़ी की मूठ पर हाथ फेरा, साहब ढीले हुए | साहब का ध्यान छड़ी पर है | वे अब छड़ी को ही संसद सदस्य समझने लगे हैं |

मैंने अब पेपरवेट उठा लिया है और उससे जी बहला रहा हूं | तिवारीजी ने छड़ी की मूठ पर लगातार हाथ फेरना शुरू कर दिया है कि साहब को तनने का मौका ही नहीं मिल रहा है | साहब ने एक पिन उठा ली है और उससे नाखून के मैल को साफ करने लगे हैं |  मेरी बड़ी इच्छा हो रही है कि पिन से दांत खोदूं |  इससे दूसरा काम नहीं होता | मैं पेपस्वट रख देता हूं और एक पिन उठा लेता हूँ | पिन से मैं दांतों का मैल साफ करने लगता हूँ।तीनों दरवाज़े की तरफ देखते हैं | फिर एक-दूसरे की तरफ बड़े दीन नयनों से देखते हैं | हम तीनों को चपरासी मार रहा है और हम कुछ कर नहीं सकते | अत्यन्त दीन भाव से साहब तिवारी जी से पूछते हैं और सुनाइए तिवारी

जी, दिल्ली के क्या हाल हैं ? 
तिवारी जी कहते हैं सब ठीक ही है |

मुझसे पूछते हैं-सुनाइए परसाई जी, साहित्य में कैसा चल रहा है ? मैं कहता हूं-ठीक ही चल रहा है |

कहीं कुछ नहीं जुड़ रहा | वे और हम दो पहाड़ियों पर इतनी दूर है कि कोई पुल हमें जोड़ नहीं सकता | हम तीनों कगार पर खड़े हैं | नीचे गहरी खाई | मगर एक-दूसरे की आवाज़ भी नहीं सुनाई देती |

साहब को घंटी की याद आती है | घंटी हर साहब की नसों के तनाव को दूर करने के लिए होती है | उन्होंने घंटी बजाई और एक चपरासी हाजिर हो गया | साहब ने कहा-चाय अभी तक नहीं आई |

चपरासी ने कहा गया है साब लेने इधर के होटल में दूध खलास हो गया | 

मारा होटलवाले ने दूध खलास किए बैठा है। पता नहीं चपरासी कितनी दूर गया है |

अब क्या करें?

साहब ने जब पेंसिल उठा ली है। वे उसे गाल पर रगड़ते हैं | मेरे दांत अब साफ हो चुके हैं | पिन उठा नहीं सकता | मैं टेबिल पर तबला बजाने लगता हूं |

साहब बहुत संकट में हैं | वे यह जानते कि पास के होटल का दूध खत्म हो गया है तो चाय पीने को बुलाते ही नहीं | हम भी घोर संकट में हैं | इन्होंने पहले चाय बुलाकर फिर हमें क्यों नहीं बुलाया है |

साहब पेंसिल गाल पर काफी रगड़ चुके दरवाजे की तरफ देखते हैं | 

फिर वही और सुनाइए तिवारीजी, दिल्ली के क्या हाल है? इस बार तिवारी जी ने तय किया कि कुछ करना ही पड़ेगा | दिल्ली के हालात पर बात चले, तो कुछ हल्कापन महसूस हो | वे बोले-कांग्रेस के दो हिस्से हो गए। सिंडिकेट निकल गई बाहर |

मेरा ख्याल था, अब बात चलेगी |

पर साहब बोले-अच्छा जी !

मैं खुद तिवारी जी से दो घंटे दिल्ली की राजनीति पर बात कर चुका था |

मेरे पास बढ़ाने की कुछ था नहीं |

तिवारी जी एक कोशिश फिर करते हैं-इंदिरा सरकार बिलकुल पुख्ता है |

साहब ने कहा-अच्छा जी !

तिवारी जी निराश होकर छड़ी की मूठ पर हाथ फेरने लगे | मैंने टेबिल पर तबला बजाना शुरू कर दिया |

कोई उपाय कारगर नहीं हो रहा |

साहब ने फिर कहा-और सुनाइए तिवारी जी, दिल्ली के क्या हाल हैं ? इस बार तिवारी जी कुछ नहीं बोलते | वे लगातार छड़ी की मूठ पर हाथ फेर रहे हैं |

हम तीनों की हालत खराब है मेरा तबला बजाने का जी भी नहीं हो रहा |

इसी वक्त चपरासी ट्रे लेकर आ गया | हम सब मुर्दे जैसे जाग पड़े | साहब के चेहरे पर पहले ऐसा भाव आता है कि उसे चांटा मार दें | फिर दूसरा भाव आता है जैसे उसके चरण छू लें | मैं खुद गुस्से से भरा बैठा था | मगर उसके आते ही मेरा मन उसके प्रति कृतज्ञता से भर गया |

हमने बहुत फुर्ती से चाय सुड़की उठे | बोले-अच्छा अब इजाजत दीजिए | उन्होंने फौरन इजाज़त दी | बोले-अच्छा जी | बैंक यू हमें उन्हें धन्यवाद देने का भी होश हवास नहीं था | वेरी मच बाहर आकर हम दोनों ने पहले खूब जोर से चार-छह सांसें लीं, फिर गाड़ी में बैठे | रास्ते-भर हम एक-दूसरे से नहीं बोले |

उतरते वक्त अलबत्ता मैंने कहा- और सुनाइए तिवारी जी, दिल्ली के क्या हाल हैं ?

तिवारी जी भन्नाकर बोले- यार, अब भूलने भी नहीं दोगे ?


"Fifteen Minutes of Suffocation" : Satire of Harishankar Parsai

              We had gone to a government office for a purpose – Member of Parliament Tiwari ji and I. While spreading in the office, the news must have reached the ears of the elder sahib that some member of parliament has come to the compound. The sahib must have opened sahabi's instruction and saw what to do if a member of parliament came to the office? The answer must have been found by giving him tea. Then you must have seen, if there is a man with him, then what to do with him? The answer must have been found - give him tea too. The sahib must have closed the Hidayatnama and told the elder babu - If Tiwari ji's work is over, then bring those people here to drink tea.

At the end of the work, the elder babu said – have tea with the sir. I have experiences of drinking formal tea with sahibs. Remembering them, I panicked a bit. But thought, this experience might be soothing too. We both entered the sahib's room. A very fake smile spread on the face of the sir. This smile is specially made by the government for its diplomats and officers. Its factory is in the public sector. The smile made in a private sector factory is on the face of the businessman.
  It is worn immediately like a fake mustache. When Zulfikar Ali saw the picture of Sardar Swaran Singh smiling with Bhutto, he would have been amazed. Indo-Pak war, fierce enmity - but the smile remains of high quality.

When the sir smiled, a problem arose in the minds of all three, what to do now? Tea is not on the table. Must have gone to get the peon.

We thought, if they have called, then all the responsibility of fulfilling them is theirs. They understood that we will take the responsibility of fulfilling it.

Seconds cut into this dilemma. In this, the sahib understood that he has to fulfill something.

Said- Hear Tiwari ji, what is the condition of Delhi?

It was such a broad question that what could be the answer except that all was well. Tiwari ji knew that even if bombs were to rain on Delhi, he did not mean it.

Gave a tired answer - all is well.

Sahib found the answer appropriate and then asked me - Tell me, Parsaiji, how is it going in literature?

I also said - everything is going well.

The talk is over There are government officers - cannot talk about politics. Nothing to do with literature

The eyes of the three of us are on the door. All three of us are looking for the peon. But the peon is the enemy of all three of us. It's not coming Don't know how far he has gone to get tea.

Sir is in his chair. When they think they are big men, they sit up straight. But when Tiwariji puts his hand on the handle of his stick, Saheb realizes that a Member of Parliament is sitting in front. They lean on the table. I am watching this exercise with great interest. Sir Tane, at this moment Tiwariji put his hand on the handle of the stick, Sahab loosened up. Sir's attention is on the stick. Now they have started thinking of stick as a member of parliament.

I have now picked up the paperweight and am enjoying it. Tiwariji has started stroking the handle of the stick continuously that the sahib is not getting a chance to stretch. The sahib has picked up a pin and has started cleaning the nail scum with it. I have a great desire to dig teeth with a pin. It doesn't work any other way. I put down the papswatt and pick up a pin. With a pin, I begin to clean the plaque. All three look at the door. Then look at each other with humble eyes. The peon is killing all three of us and we cannot do anything. With a very humble sentiment, sir asks Tiwari ji and listen to Tiwari.

Sir, how are you in Delhi?
Tiwari ji says everything is fine.

Ask me - Hear, Parsai ji, how is it going in literature? I say - it's going well.

Nothing is connecting anywhere. He and I are on two hills so far apart that no bridge can connect us. All three of us are standing on the brink. deep ditch below | But each other's voice is not even heard.

Sahab misses the bell. The bell is meant to relieve the tension of every sahib's nerves. He rang the bell and a peon appeared. The sahib said - the tea has not come yet.

The peon has said that the milk got spoiled in the hotel here.


Mara hotelier is sitting drinking milk. Don't know how far the peon has gone.

What should we do now?

When sir has picked up the pencil. They rub it on the cheek. My teeth are clean now. Cannot lift pin I start playing tabla on the table.

Sir is in great trouble. When they knew that the nearby hotel had run out of milk, they didn't even invite them to drink tea. We too are in dire straits. Why didn't he invite us first by calling him tea?

Sir looks at the door with a pencil rubbed on his cheek.

Then tell the same thing, Tiwariji, what is the condition of Delhi? This time Tiwari ji decided that something has to be done. If we talk about the situation in Delhi, then some lightness should be felt. He said – Congress has become two parts. Syndicate exited.

I thought, now it will work.

But the sahib said - good sir!

I myself had talked to Tiwari ji for two hours on the politics of Delhi.

I didn't have anything to increase.

Tiwari ji makes an effort again - the Indira government is absolutely solid.

The sir said - good sir!

Disappointed, Tiwari ji started stroking the handle of the stick. I started playing tabla on the table.
None of the solutions are working.

Sahab said again - and tell Tiwari ji, what is the condition of Delhi? This time Tiwari ji does not say anything. They are constantly stroking the handle of the stick.

The condition of all three of us is bad, I am not even able to play the tabla.

At the same time the peon came with the tray. We all woke up like dead At first such a feeling comes on the face of the sahib that he should be slapped. Then the second sense comes, as if touch his feet. I myself was filled with anger. But as soon as he came, my heart was filled with gratitude towards him.

We sipped tea very quickly. Said - okay now allow me. He immediately gave permission. Said - well Bank U we didn't even feel conscious to thank them. Coming out very much, both of us first took four-six breaths very loudly, then sat in the car. We did not speak to each other all along the way.

While getting down, however, I said – and tell Tiwari ji, what is the condition of Delhi?

Tiwari ji Bhannakar said - Man, will you not even let me forget now?


साथियों अगर आपको यह पोस्ट (जानकारी) अच्छी लगी हो तो इसे आप अपने दोस्तों जानकारों में व्हाट्सऐप फेसबुक ग्रुप स्टेटस आदि पर शेयर करें। 
अगर ऐसी ही अन्य महत्वपूर्ण जानकारी जैसे महापुरुषों एवं महामाताएं के अनमोल विचार, कहानी, निबंध, उपन्यास आदि पढ़ना सुनना हो तो यूट्यूब पर सर्च करें 👉 epustakalay धन्यवाद। या फिर इस लिंक 🔗 को कॉपी करें और देखें 👇👇
https://youtube.com/channel/UCy3G2MI15QPPUzcpNwAFIeQ
धन्यवाद 📚✍️🙏